प्रीमियर लीग के व्यस्त शेड्यूल से खिलाड़ियों की सेहत पर संकट, विशेषज्ञों ने जताई चिंता
प्रीमियर लीग भले ही तीन सप्ताह के ब्रेक के बाद लौट आई है, लेकिन इसके कई स्टार खिलाड़ियों को आराम नहीं मिला है। अंतरराष्ट्रीय ब्रेक के दौरान, प्रीमियर लीग के 25 खिलाड़ियों ने कुल 360 मिनट यानी चार पूरे मैचों तक फुटबॉल खेला।
इनमें वे 13 खिलाड़ी भी शामिल हैं जिन्होंने विश्व कप में अपने क्लबों का प्रतिनिधित्व किया था। लिवरपूल के कप्तान वर्जिल वैन डिक जैसे खिलाड़ी, जिन्होंने पिछले सीजन में क्लब के लिए 55 मैच खेले थे, इस सूची में शामिल हैं। वैन डिक के अलावा डेक्लान राइस, मॉर्गन रोजर्स और हैरी केन जैसे कई ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने 2025-26 के सभी टूर्नामेंटों में 4,000 मिनट से अधिक फुटबॉल खेला है और इस सीजन में भी वे उसी राह पर चल रहे हैं।
खेल वैज्ञानिकों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इस स्तर को बरकरार रखना संभव नहीं है। लिंकन विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान, खेल विज्ञान और कल्याण विभाग के प्रमुख डॉ. डेव रिचर्डसन ने बताया कि यह स्थिति टिकाऊ नहीं है। उन्होंने कहा कि हम जल्द ही प्रदर्शन की गुणवत्ता को लेकर असंतोष देखेंगे, क्योंकि प्रशंसक उच्च गुणवत्ता वाला खेल देखने के लिए भुगतान करते हैं।
भारी शेड्यूल का असर यह है कि खिलाड़ी अब अपने मैचों का चयन करने लगे हैं। नवीनतम अंतरराष्ट्रीय विंडो से पहले कोल पामर, मार्कस रैशफोर्ड, राइस, कोबी मेनू और टीनो लिवरामेंटो ने इंग्लैंड की टीम से अपना नाम वापस ले लिया। जर्मनी के काई हैवर्ट्ज और फ्रांस के कप्तान किलियन एम्बाप्पे ने भी हालिया अंतरराष्ट्रीय ब्रेक से नाम वापस ले लिया था।
मानसिक स्वास्थ्य के प्रति दृष्टिकोण समय के साथ पीछे जा रहा है
प्रोफेशनल फुटबॉलर्स एसोसिएशन (PFA) के सीईओ महेता मोलंगो ने खिलाड़ियों के नाम वापस लेने को एक “बीमार” प्रणाली का प्रतीक बताया। मोलंगो ने कहा कि जब इंग्लैंड को पांच खिलाड़ियों को टीम से बाहर करना पड़ता है, तो सवाल उठता है कि इस उद्योग में क्या गलत है। उन्होंने कहा कि खिलाड़ी अपने देश के लिए खेलना चाहते हैं, लेकिन शरीर की एक सीमा होती है और आप जीव विज्ञान (biology) को धोखा नहीं दे सकते।
मोलंगो गर्मियों में तीन सप्ताह का अनिवार्य ब्रेक और तीन सप्ताह का “री-ट्रेनिंग” पीरियड चाहते हैं। हालांकि, लिवरपूल के साथ काम कर चुके डॉ. रिचर्डसन का कहना है कि खेल निकायों की वर्तमान बिखरी हुई प्रणाली में यह असंभव है। उन्होंने कहा कि खेल के शेड्यूल को नियंत्रित करने वाली कोई एक स्वतंत्र संस्था नहीं है और सभी अपनी श्रेष्ठता साबित करना चाहते हैं।
कार्डिफ यूनिवर्सिटी में मनोवैज्ञानिक और खेल प्रदर्शन पर नींद के प्रभाव के विशेषज्ञ डॉ. क्रिस जेम्स का कहना है कि पुरुष फुटबॉल खिलाड़ियों की देखभाल के अपने कर्तव्य में विफल हो रहा है। उन्होंने कहा कि यहां ऐसी संस्कृति है जहां खिलाड़ियों को हर समय फिट दिखना पड़ता है। मानसिक स्वास्थ्य के प्रति यह रवैया पुराने दौर की याद दिलाता है।
‘खिलाड़ी इन मैचों में खेलना चाहते हैं’
हालांकि, क्या खिलाड़ी खुद ऐसा महसूस करते हैं? पूर्व इंग्लैंड डिफेंडर मैट अप्सन का कहना है कि शुरुआती अंतरराष्ट्रीय ब्रेक के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं। उन्होंने कहा कि इस दौरान प्रबंधक प्रशिक्षण के मैदान पर बहुत काम कर सकते हैं, लेकिन सीजन के इस स्तर पर चार मैच खेलना बहुत अधिक है।
इंग्लैंड के पूर्व साथी पॉल रॉबिन्सन का मानना है कि मैचों के बीच उचित तैयारी जरूरी है, लेकिन खिलाड़ियों के मिनट कम करने की कोशिश बेकार होगी। उन्होंने कहा कि फुटबॉलर्स के नजरिए से यदि वे खुद को प्रबंधित कर सकें तो शेड्यूल बहुत चुनौतीपूर्ण नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि यदि एर्लिंग हालैंड या हैरी केन को सीजन के अंत में तीन सप्ताह का ब्रेक दिया जाए, तो क्या वे इसे स्वीकार करेंगे? उन्होंने कहा कि इसकी कोई संभावना नहीं है क्योंकि खिलाड़ी इन मैचों में खेलना चाहते हैं।
‘करें तो मुसीबत, न करें तो भी मुसीबत’
डॉ. जेम्स का कहना है कि सीजन में दर्जनों मैच खेलने का उत्साह केवल अस्थायी है, जबकि चोट का जोखिम और हमेशा उच्च स्तर पर बने रहने का दबाव कहीं अधिक खतरनाक है। उनका कहना है कि खिलाड़ी ध्यान केंद्रित रहने के लिए ‘स्नस’ (snus) जैसे माध्यमों का सहारा ले रहे हैं।
डॉ. जेम्स के अनुसार, फुटबॉल अभी भी शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रिकवरी की आवश्यकता को नहीं समझता है। शारीरिक भार बढ़ने से चोटों की संभावना बढ़ती है, जिसका गहरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है। खिलाड़ी प्रदर्शन न कर पाने के डर और अनुबंध को लेकर तनाव में रहते हैं। क्लबों को खिलाड़ियों को ‘डाउनटाइम’ के लाभ के बारे में शिक्षित करने की जरूरत है।
डॉ. रिचर्डसन ने कहा कि कुछ क्लब खिलाड़ियों का समर्थन करने में बेहतर हैं, जैसे ब्रेंटफोर्ड की खेल मनोविज्ञान टीम। लेकिन क्लब विश्व कप के आने, विश्व कप के संभावित विस्तार और प्रीमियर लीग व यूएफा प्रतियोगिताओं में मैचों की संख्या कम न होने से कोई स्पष्ट रास्ता नजर नहीं आ रहा है। उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों का कैलेंडर पर बहुत कम नियंत्रण है, जिसके कारण कुछ खिलाड़ी अब खेल से दूरी बना रहे हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जहां खिलाड़ी “करें तो मुसीबत, न करें तो भी मुसीबत” जैसी स्थिति में फंस गए हैं।
