विश्व कप सेमीफाइनल: फ्रांस के आक्रामक खेल के सामने स्पेन की मजबूत रणनीति की चुनौती
फ्रांस ने इस विश्व कप में अब तक शानदार प्रदर्शन किया है। टीम के हमलावर खिलाड़ी पूरी आजादी के साथ खेल रहे हैं, लेकिन कोच डिडिएर डेशम्प्स के लिए एक चिंता लगातार बनी हुई है। डेशम्प्स ने पत्रकारों से टीम की कमियां बताने तक को कहा है, और अब इस हफ्ते वह चिंता एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आई है।
सवाल यह है कि स्पेन के तीन मिडफील्डरों के सामने फ्रांस अपने दो मिडफील्डरों के साथ कैसे तालमेल बिठाएगा? जो टीम अब तक अपने विरोधियों पर भारी पड़ती रही है, उसे अचानक बीच मैदान में संख्या बल की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
डेशम्प्स की टीम के सामने अब यह सवाल है कि क्या वे इस स्थिति के लिए अपनी रणनीति पूरी तरह बदलें या फिर अपने फॉरवर्ड खिलाड़ियों पर भरोसा बनाए रखें, जिन्होंने अब तक छह मैचों में 16 गोल दागे हैं।
स्पेन अपनी शैली में कोई बदलाव नहीं करेगा। इस विश्व कप में स्पेन के पास सबसे स्पष्ट और संपूर्ण सामरिक सोच है। लैमिन यमल जैसे खिलाड़ी को टीम में एक तय भूमिका मिली हुई है। स्पेन का रक्षात्मक रिकॉर्ड बेहतरीन है और उन्होंने पूरे टूर्नामेंट में केवल एक गोल खाया है। इसका मुख्य कारण उनका आक्रामक रुख है, जहां वे गेंद खोने के औसतन 11.57 सेकंड के भीतर उसे वापस छीन लेते हैं। स्पेन अपनी रक्षा पंक्ति को आगे रखकर खेलता है, जिसका फायदा काइलियन एम्बाप्पे और उस्मान डेम्बेले जैसे खिलाड़ी उठाना चाहेंगे।
यह मुकाबला केवल सर्वश्रेष्ठ डिफेंस बनाम सर्वश्रेष्ठ अटैक का नहीं है। स्पेन का खेल नियंत्रण और पोजिशन पर आधारित है, जबकि डेशम्प्स अपने हमलावरों को अधिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता देते हैं। यह एक तरह से आर्केस्ट्रा बनाम फ्री जैज़ जैसा मुकाबला है।
फ्रांस के पास रॉड्री जैसा पारंपरिक ‘नंबर-सिक्स’ खिलाड़ी नहीं है, इसलिए डेशम्प्स को एड्रियन रैबियोट और ऑरेलियन चुआमेनी के साथ काम चलाना पड़ रहा है। दूसरी ओर, स्पेन के पास इस भूमिका के लिए विकल्प मौजूद हैं। फ्रांस के लिए चुनौती यह है कि वे मिडफील्ड में संख्या कम होने के बावजूद अपने हमलों को कैसे धार दें।
स्पेन ने बेल्जियम के खिलाफ गोल खाने के बाद भी अपना संयम नहीं खोया और खेल जारी रखा। अब फ्रांस के खिलाफ भी उन्हें अपनी इसी रणनीति पर टिके रहना होगा ताकि विपक्षी हमलावरों को गेंद तक पहुंचने से रोका जा सके। यह मुकाबला केवल एक मैच नहीं, बल्कि आधुनिक फुटबॉल के दो अलग-अलग दर्शनों का टकराव है।
